नरगिस 

आईने में वो देखती 
बेखबर अपने आप से 
लगाती वो बिंदी 
थम जाता था समय
लफ्ज़ ना कोई करे बयान 
जो कहती थी उसकी आँखें 
सिमटी उनमे वो यादें 
बीता था जो समां

BRIJ BARI

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